रहस्यमयी मंजिल

सबसे उंचे पर्वत की
सबसे उंची चोटी से
मैंने आज उस
नीले अम्बर को देखा
वो आकाश अब भी
उतना ही दूर था
जितना पहले हुआ करता था।

इस बात को लेकर
मैं बहुत असमंजस में था
आज फिर मुझे
इस असमंजस में देख

एक तीक्ष्ण रोशनी की किरण
उस अम्बर की विशाल काया से
न जाने कितना लम्बा
सफर तय करके
मेरे पास आई
और मुझसे केवल
एक बात कहकर चली गई।

कि
तुम जिस उंचाई पर
आज खड़े होकर
इस अम्बर की गहराई/उंचाई
को छूने की कोशिश कर रहे हो
वो उंचाई अभी भी बहुत कम है

तुम बहुत ही सूक्ष्म हो
इस विशाल अम्बर के सामने
जिसे तुम महसूस नहीं कर सकते
तुम इस उंचाई को
अपनी सफलता की
पहली सीढी कह सकते हो
अभी तो चढना है तुम्हे बहुत उपर
अपने उस लक्ष्य को पाने के लिए
जो आज भी तुम्हारे लिए अदृश्य है

मेरे कुछ कहने से पहले
वो वापस उस विशाल नीली
काया में
विलुप्त हो गई।
और छोड़ गई
मेरे पास एक और
रहस्य सुलझाने के लिए

आखिर क्या होगी
वह अनजान उंचाई जो
इस नीले अम्बर को छूने
के लिए सर्वोत्तम होगी।

शायद, आज
उस उंचाई की कल्पना भी
मैंन नहीं कर सकता। लेकिन
वो अकल्पनी, अनजान
रहस्यमयी उंचाई ही
मेरी मंजिल है।
जहां तक का सफर मुझे
आगे तय करना है।

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