मैं रेल्वे स्टेशन पर खड़ा गाड़ी का इंतजार कर रहा था। उस दिन गाड़ी में उस दिन रेल्वे स्टेशन पर बहुत भीड़ थी। गाड़ी धीरे- धीरे स्टेशन के निकट आती जा रही थी सभी लोग अपना- अपना सामान लेकर आगे कि ओर चल पड़े। मैं भी अपना सामान चल दिया। मैं भीड़ में घुसकर अंदर चढ़ने की कोशिश करने लगा। अंत में भीड़ के कारण में और अन्य यात्री नहीं चढ़ पाये। गाड़ी आगे चल दी। पर कुछ दूर जाकर गाड़ी फिर से रुक गई। हमसभी ने फिर भागकर चढ़ना शुरु किया। सभी को बहुत हड़वड़ाहट हो रही थी। इतने में किसी का सामान गिर गया। वह उसे उठाने लगा। तब आगे के गार्ड ने कहा कि आराम से चढ़ जाइये। गाड़ी आप लोगों के लिए ही रोकी हैं। इसके बाद की गाड़ी ने सीट दी। और धीरे-धीरे आगे चल दी। गाड़ी के अंदर जगह आराम से मिल गयी। गाड़ी तेजी से चली जा रही थी। मैं कुछ निकलकर पढ़ने लगा। कि थोड़ी देर बाद गाड़ी की गति धीमी हो गई। खिड़की से बाहर का दृश्य देखा तो आँखें खुली रह गई। पलकों ने झपकना बंद कर दिया। चारों ओर ऊँचें- ऊँचें घुमावदार बड़े पहाड़ो पर गाड़ी चढ़ती जा रही थी। बड़े- बड़े हरे पेड़ो में रंग-बिरंगे फूल मानो प्रकृति की सुन्दरता में चार चांद लगा रहे हो। गाड़ी के चलने से जो हवा खिड़की से अंदर आ रही थी। उसमें ठंडी हवा के साथ-साथ उन फूलों की भीनी-भीनी सुगंध भी मौजूद थी। मौसम बहुत ही सुन्दर और सुहावन लग रहा था। एक घाटी चढ़ने के बाद गाड़ी एक जगह पर रुक गई। मुझे अभी लंबा सफर तय करना था। इसलिए लोगों के साथ मैं भी रेल से बाहर उतर गया। रेल के बाहर उतरकर ऐसा लगा। मानो प्राकृति की सारी सुन्दरता सिमटकर यही आ गई हो। आसमान के बादल अब ज्यादा दूर नही थे। चारों ओर ऊँचे- ऊँचे पहाड़ थे। खाईयाँ थी। परंतु वे भी प्रकृति की सुन्दरता बढ़ा रही थी। वहाँ पर मैंने चाय पी। और रेल में चढ़ गया। सभी यात्रीयों के चढ़ने के बाद गाड़ी आगे चल दी। सुरंगो में से हाती हुई। पहाड़ो पर घुमकर काटती हुई। गाड़ी एक जगह पर आकर रुक गई। दरअसल मुझे यही पर आना था। गाड़ी से उतरकर मैने कही रुकने का विचार किया। लोगों से पूछने पर चला कि यहाँ एक धर्मशाला है। यात्री अक्सर वहीं पर रुका करते है। मैं भी वहीं चल दिया मेरे साथ और भी लोग वहीं आ रहें थे। मैंने वहीं पर रुकने का फेसला किया। शाम हो चुकी थी। इसलिए रात को रूककर मैंने सुबह उठकर वहां घूमने के लिए एक पुस्तक खरीदी। और घोड़ा गाड़ी से उन जगहो पर चल दिया। जिनका वर्णन पुस्तक में किया गया था तांगे वाला बोला कि मैं आपको पहले ऐसी जगह ले चलता हूँ। कि वहाँ से आने की आपकी इच्छा नहीं होगी। मैंने कहा ठीक है। तांगे वाले ने मुझे वहाँ लाकर छोड़ दिया। मैने देखा कि सुबह के ५. ०० बज रहे थे। और दो पहाड़ो के नीचे से सूर्य (लाल ) सिंदूरी रंग के गोले के रुप में धीरे- धीरे ऊपर उठ रहा था। सूर्य की पहली किरण पहाड़ों की बीच बने हुए तालाब पर बने हुए तालाब पर पड़ी। और उसके बाद (उसने ) सूर्य ने अपनी छटाओं को बिखेरना प्रारंभ किया। मंद-मंद ठंड हवा के साथ धीमी-धीमी धूप ने मन को फुल्लित कर दिया। बादलों के कारण धूप भी अच्छी लग रहीं थी। चारों ओर देखा तो झील, नदी, झरने, पहाड़ सब कुछ दिख रहा था। उस जगह आकर प्रकृति की गोद में होने का आभास हो रहा था। ऊपर से गिरते हुए झरने का पानी जब नीचे गिरता था तो मानो मोती गिर रहे हो। चारों तरफ हरियाली ही हरियाली इसके बाद पिछे मुड़ा तो तांगे वाला खड़ा मेरा इंतजार कर रहा था। मैं उसके पास पहुँचा। तो वह मुझे दूसरी जगह ले गया। वह भी किसी जन्नत से कम नही थी। वहाँ पहुँचने में एक घंटा लग गया। क्योंकि दूरी तो कम थी। परंतु पहाड़ो की चोटी तक पहुँचने में वक्त तो लगता है। वहाँ पहुँचकर देखा तो अपने आप को बीच पाया। चरों ओर बादल ही बादल थे।हल्की-हल्की फुहार चल रही थी।मुझे अब पैदल ही बहुत ऊँची चढाई तय करनी थी। क्योंकि रोड सकड़ी होने की वजह से वहाँ वाहनों का आना मना था। मैंने चढ़ने से पहले बिस्कुट सेब, फल आदि सामान लिया। और अपनी मंजिल की ओर बढ़ गया। चलते-चलते मैने बहुत से पहाड़ी को देखा। पक्षीयों को देखा। बहुत ही सुन्दर जानवर एवं पक्षी थे। अटरवलियाँ करते हुए पहाड़ी हिरण भी अच्छे लग रहे थे। पहाड़ पर चढ़ते- चढ़ते ठंड बढ़ गई थी इसलिए मैने एक कोट निकालकर पहन लिया। और अपनी चढ़ाई जारी कर दी। ११ बज चुके थे। मुझे भख लग आई थी। तभी किसी खाली स्थान पर घंटे की आवाज आ रही थी । वहॉ जाने में आधा घंटा लग गया । लोगो ने कहा कि वहॉ कोई कार्यक्रम था। मंदिर बहुत ही सुंदर था। दर्शन कर मैं बाहर आ गया । वहॉ पर भंडारे का आयोजन किया गया था। तो मैं भी वहीं पर बैठ गया। प्रसाद खाकर अपनी चढ़ाई प्रारंभ कर दी। चारो ओर घने बादलों के होने के कारण आगे का रास्ता साफ दिखाई नहीं पड़ रहा था। चोटी पर पहुंचकर आगे देखा तो मैं दंग रह गया मैंने देखा कि मैं बहुत ही ऊंचाई पर चढ़ आया हूं चारों ओर सूर्य का प्रकाश फैल चुका था। इसलिए अब सबकुछ साफ साफ दिख रहा था। दूर दूर तक पहाड़ ही पहाड़ थे। ऊपर चढ़ने में मुझे चार घंटे लग गए। मैं वहॉ एक घंटा रुका और प्रकृति की सुंदरता को निहारता रहा। फिर मैं नीचे उतरने लगा। नीचे पहुंचकर समय देखा तो ६ बज चुके थे। अब मैंने वापस धर्मशाला जाने का विचार किया। तांगें वाला ८ बजे तक धर्मशाला छोड़ गया। अगले दिन सुबह मैं ५ बजे उठ गया। तैयार होकर बाहर नाश्ता किया और उसी घोड़ेगाड़ी से अगला सफर शुरु कर दिया। अब मुझे ऐसे स्थान पर जाना था। जिसे सपनों की दुनिया कहा जाता है। आकाश में काले बादल छाए हुए थे। सूर्य का प्रकाश और तेज कम था। जमीन पर एक खूबसूरत तालाब था तो सामने ही एक बहुत सुंदर पहाड़ था। जिस पर घने वनों के बीच एक प्यारी सी, सुंदर सी पहाड़ी पर लोगों की दुनिया थी। जब मुझे यह बात पता चली तो मैं तालाब का आनंद लेकर पहाड़ी रास्ते से उस पहाड़ी की ओर चल पड़ा। मौंसम बहुत सुहाना था। और सड़क भी अच्छी थी। जिस पर घेड़ागाड़ी दौड़ी चली जा रही थी। घोड़ागाड़ी मे बैठने का तो मजा ही कुछ और होता है। गाड़ी वाले से बातें करते करते हम उस पहाड़ी तक पहुंच गए। वहॉ के पहाड़ी लोग मुझे आश्चर्य से देखने लगे। पर जब घोड़ागाड़ी वाले ने मेरा परिचय कराया तो सभी ने मेरा खूब आदर सत्कार किया। उनका जीवन इतना सादा स्वच्छ और अच्छा था कि वहॉ जाकर वहीं रम जाने का दिल करता था। आस- पास झरने थे। जो कल-कल कर रहे थे। पेड़ों पर पंछियो की मधुर ध्वनि थी। आस- पास बगीचे भी थे। जिन्हें वास्तव में उन लोगों ने बहुत सजाकर रखा था। मैंने उन लोगों के साथ कुछ समय बिताकर एक नया अनुभव पा लिया था। उन लोगों का जीवन वास्तव में आदर और प्रसंशा करने लायक था। उनसे विदा लेकर मैं वापस धर्मशाला लौट आया। तीसरे दिन मैं तैयार होकर बाहर निकला तो बहुत तेज हवाएं चल रही थीं लोग घरों में से इस हवा का आनंद ले रहे थे परंतु मैं इस तीव्र वेग से बहती हुई हवा का आनंद लेने के लिए बाहर निकला और उस तेज हवा मे खड़ा हो गया। मैं प्रकृति का पुजारी हूं इसलिये मुझे इसकी हर हरकत में कुछ न कुछ अच्छाई हमेशा दिखाई दे जाती है। नदी, पहाड़, झरने, तालाब, समुद्र, आकाश, पंछी, हवा ये सभी प्रकृति के अंग हैं और मुझे ये काफी हद तक प्रभावित करते हैं। हवा कम हो चुकी थी अब मैं भी बिलकुल तैयार था किसी नये नजारे को देखने के लिए और उसमें से कुछ अच्छाईयां ग्रहण करने के लिए। या यूं कहें अपनी मां की गोद में जाने के लिए। मैंने तांगे वाले को देखा वह मेरा इंतजार कर रहा था। मैंने उससे अब पूछा कि अब तुम मुझे कहां ले जाने की इच्छा रखते हो या अब हम कहां चलेगे। इस पर तांगे वाला बोला अब मैं आपको कुछ नहीं बताउंगा आप बस बैठ जाइये। मैं गाड़ी में बैठा और गाड़ी अपनी रफ्तार से आगे बड़ दी। अब मेरे मन में भी काफी रोमांच था क्योंकि जहां मैं जा रहा था उसकी कोई आउटलाइन मेरे पास नहीं थी। मैंने सूर्य की पहली किरण को नमस्कार किया और हम पहुंच गये उस अनजान जगह पर जिसका न कोई अंदाजा था और न कोई सोच। वास्तव में वह एक जंगल था। जहां पर बहुत उंचे उंचे पेड लगे थे। और कुछ मैदान भी था। मैंने तांगे वाले से पूछा कि यह तो बहुत ही साधारण स्थान है तब तांगे वाले ने मुझे बीच में रोकते हुए कहा कि अभी आप कुछ देर यहां का आनंद लीजिए कुछ समय बाद आप जान जाएंगे कि यह कैसी जगह है। मैंने उसकी बात मान ली और वहां पर घूमने लगा। घूमते घूमते मैं थोड़ा दूर निकल आया था। लगभग आधा घंटा बीत चुका था। पेड़ों की संख्या भी धीरे धीरे न के बराबर हो गई थी अब केवल एक मैदान था लेकिन ये क्या मैंने कुछ आगे और देखा तो एक इतनी बड़ी खाई थी कि कभी सपने में भी नहीं सोच सकता था। नीचे देखा तो बहुत ही छोटी एक नदी दिखाई पड़ रही थी। कुछ छोटे बड़े पहाड़ भी थे। और सूर्य मेरे सामने से निकलता हुआ मुझे बिलकुल गोल स्पष्ट दिखाई दे रहा था। आगे का सफ़र फ़िर कभी…
Thanx,it worked for me. i needed for my project…thankx…:)
By: MAYURAKSHI SARKAR on जुलाई 9, 2010
at 2:42 अपराह्न
It is only imagination, I dont know whether this place exist or not
By: smriti5 on जुलाई 10, 2010
at 11:28 पूर्वाह्न
thanxxxxxxx a lot!!!!!!!!!!!!!………………….. …………..it really helped me a lot!!!!!!!!!!!!!
u will have a good future if u bcom a writer…………1!!!!!!!!!!!!!!!!!
By: v.sindhura on फ़रवरी 28, 2011
at 8:28 पूर्वाह्न
Its only an imagination, dont knw whether this places exist or not.
By: smriti5 on फ़रवरी 28, 2011
at 11:35 पूर्वाह्न
thanks i needed it for my project
By: keerthi on जून 21, 2011
at 10:02 पूर्वाह्न