कुछ देर सोने के बहाने,
उस समय बहती हुई
हवा की शीतलता का
आनंद लेने के बहाने,
मैं
उन घनी वादियों
और उस विशाल पर्वत पर,
बिलकुल स्वतंत्रता से
सो गया।
आकाश साफ था,
चारों ओर हरियाली
विखेरते हुए पेड़,
मंद-मंद बहती हुई
हवा के साथ-साथ
उन फूलों की भीनी-२
सुगंध भी मौजूद थी।
जब मैं नींद के
आगोश में खो गया,
तब
उस शीतल हवा ने
मेरे पैरों से टकराकर,
कुछ कहने का आभास कराया।
जब मैं जागकर खड़ा हुआ,
तो उसी हवा ने
तेज बहकर,
अपने वेग का
आभास कराया।
आंखें बंद की,
तो उसी हवा ने
शीतलता देकर,
अपने अस्तित्व का
परिचय कराया।
जब मैं
सूर्य की गर्मी से
तपने लगा,
तो उसी हवा ने
सूर्य के तेज से बचाकर,
उन घने पेड़ों की
छांव में,
भीनी-भीनी सुगंध लिये
अपने प्रेम का
परिचय कराया।
वो मुझसे कहने लगी,
कि तुम मुझे केवल
महसूस कर सकते हो,
समा नहीं सकते
मुझे अपने अंदर,
अपने अस्तित्व में
क्योंकि
मेरा स्वरूप,
मेरा व्यवहार,
बदलता रहता है,
समय-समय पर।
आज तुम्हारे लिये
मैं शीतल बनी हूं,
लेकिन कुछ समय बाद
मैं प्रकृति की आज्ञा से
गर्म हो जाउंगी,
और यहां से
बहुत दूर चली जाउंगी,
जहां तुम मुझ तक
नहीं पहुंच पाओगे
और मुझे ढूंढने की कोशिश
भी मत करना
क्योंकि मैं यहां से कहां जाउंगी
यह तो मुझे भी नहीं मालूम।
लेकिन हां
फिर समय आने पर
मैं तुम्हारे पास आउंगी
और हम बहुत सारी
बातें करेंगे।
कुछ अनुभव तुम कहना
कुछ मैं कहूंगी।