इस जीवन के विषय में
सोचता हुआ,
कुछ पाता,
और कुछ खोता हुआ।
मंजिल के पथ पर
निरंतर बढ़ता हुआ,
मैं न जाने
कहां आकर थम गया।
जिंदगी वीरान सी
लगने लगी,
चारों ओर खामोशी
भटकने लगी।
अचानक एक झोंका आया
हवा का,
और मुझे न जाने
कहां ले गया।
एक अनजानी जगह पर
लाकर छोड़ गया।
वह जगह तो थी
मेरे लिए अनजानी,
पर कुदरत ने की थी
अपनी मनमानी।
जब चारों ओर के
विशाल पर्वतों को देखकर,
अपने ही मन की
गहराईयों में झांककर।
मैंने देखा-
कि मन की एक किरण
उन आकाशचुंबी
पर्वतों को
निहार रही थी,
मन ही मन
मुस्करा रही थी
बहुत ही सुखद
अनुभव पा रही थी
मुस्कराने का कारण पूछा
तो बोली-
यही तो तेरी मंजिल है
जहॉं तुझे आना था
जीवन का उद्देश्य
जो अधूरा रह गया था
उसे पूरा करना था
उस खामोशी
और वीरानगी से निकलकर
इस खुले आकाश के नीचे
इन ऊंचे पर्वतों के बीच
तुझे अपना जीवन
बिताना होगा
प्रकृति से कुछ
अनुभव पाना होगा
प्रकृति के बीच रहकर
तू देखेगा
कि तेरे जीवन में
कितना बदलाव आया है
दुनिया ने जहॉं तुझे
अकेला छोड़ा था
वहां से तू अकेला ही
कितनी दूर चला आया है।