मैं
जो उंचे-उंचे सपने
देखा करता था,
नए-नए सपने
बुना करता था,
उंचाईयों के सपनो में
खोया रहता था,
आज बुनने लगा हूं
मैं ऐसे सपने
जिनका अस्तित्व
इस ब्रम्हांड में मौजूद है।
मेरे मन में
जो इच्छाएं थीं,
मेरे मस्तिष्क में
जो विचार थे,
मेरे विचारों में
जो क्रांति थी,
मुझमें जितनी
अच्छाईयां थीं,
अचानक
आ गया है
उनमें नया रोमांच
नया जोश, नई उमंग
मैं सोचा करता था
कि एक बाज की तरह
आसमान की बुलंदियों को
छू लूंगा एक दिन
लेकिन
आज मेरे सपनों का बाज
मेरी सफलता की कसौटी पर
खरा नहीं उतरता, क्योंकि
मेरा लक्ष्य
उस बाज की उंचाई से
कहीं अधिक उंचा है।
सपने
व्यक्ति के जीवन का
अहम् हिस्सा होते हैं
सपने
जब बुने जाते हैं
तब ही उनके सच होने की
कल्पना की जा सकती है।
लेकिन यह भी सच है
कि सभी सपने पूरे नहीं होते
और जो सपने
पूरे नहीं हो सकते
उन्हें
देखना तो चाहिए
लेकिन उनके पूरे होने की आशा में
आज को नहीं खोना चाहिए
क्योंकि
बहुत तकलीफ होती है,
बहुत दर्द होता है,
जब कोई पूरा होता हुआ
सपना टूट जाता है।
एक सच जो मैंने पाया है
वह कि हम सब
माटी के पुतले हैं
हम अपनी इच्छाओं
के बल पर नहीं जीते
हम विवश हैं,
अपने भाग्य के आगे,
क्योंकि हम कुछ नहीं करते
सब कुछ
अपने आप ही होता है।
जो हम समझ नहीं पाते
और इसे समझने की
कोशिश भी व्यर्थ है।
nice poem
By: vishal on अगस्त 2, 2008
at 3:50 अपराह्न
Very very nice and truly poem.
i like very much this poem……
By: Tara Pareek on अप्रैल 29, 2009
at 6:51 पूर्वाह्न