दुनिया में है कितना शोरगुल
हर तरफ है एक अनजान हलचल
मन में है एक अजीब सी उथल-पुथल
और इतनी आवाजों के बीच भी
मैं खामोशी से जीवन जिए जा रहा हूँ
हर समय, हर और है एक चहल-पहल
निशा के अँधेरे में भी है
एक शांत सी हलचल तो
भोर की खामोशी में भी है
पंछियों की किलकिल
और इतनी आवाजों के बीच भी मैं
खामोशी से जीवन जिए जा रहा हूँ
शांत हवा में भी सरसराहट है
शीतल नदी में भी कलकल ध्वनी है
अग्नि में चरचराहट है
बादलों में भी गडगडाहट है तो
धरती में भी अनजान सी गुंजन है
और इन पञ्च वाचाल तत्वों से बना मैं
इतनी आवाजों के बीच भी मैं
खामोशी से जीवन जिए जा रहा हूँ
हर तरह-तरह की
आवाजों के अंतर्मन में
छुपी हुई खामोशी से
बात करता हुआ
उस खामोशी को उसके
अन्दर के शोर से
परिचित कराता हुआ
खामोशी के मन में उठने वाले
हर प्रश्न का उत्तर देता हुआ
मैं शांति से चला जा रहा हूँ
और खोज रहा हूँ
उन नयी आवाजों को
जो अपने अंतर्मन की खामोशी
से परिचित होना चाहती है