जो विचार मेरे मन मे हैं,
उसे कैसे कह दूं।
जो चीज मैं अनुभव करता हूं,
उसे कैसे कह दूं।
जो दृश्य
मैं बंद आंखों से देखता हूं,
उसे कैसे कह दूं।
जिन कल्पनाओं के सागर में
मैं हमेशा डूबा रहता हूं,
उसे कैसे कह दूं।
जिस उंचाई की मैं
कल्पना करता हूं
उसे कैसे कह दूं।
तुम ही बताओ
मैं कैसे कह दूं।
यदि अनुभव की बात करूं
तो भूतकाल मुझे रोक देता है।
यदि भविष्य की बात करूं
तो वर्तमान मुझे रोक देता है।।
यदि अध्यात्म की बात करूं
तो सामाजिक बंधन मुझे रोक देते हैं
यदि दूसरों की बात करूं
तो स्वार्थ मुझे रोक देता है
यदि अपनी ही बात करूं
तो दुनिया मुझे रोक देती है।
और तुम कहते हो कुछ कहो
अब तुम ही बताओ
मैं कैसे कह दू।
really nice…
By: Ranu Jain on सितम्बर 13, 2009
at 5:22 पूर्वाह्न